Wednesday, May 05, 2010

मितवा, कभी तुमने मुझसे पूछा था के तुम मेरे लिए क्या हो। अरसों से सुनी हुईं कविताएँ याद आईं थी। कुछ चुनिंदे अशआर। गुलज़ार की कुछ नज़्में। और तो और, नाना पाटेकर की आवाज़ में "कैसे बताऊँ तुम्हें तुम मेरे लिए क्या हो.." भी ! इनमें से कुछ न सुनाया तुम्हें। सब तो तुम पहले से जानती थी। कुछ चीज़ें तो तुम्हीं ने सुनाईं थी मुझे।


सुंदर लिखावट जैसे सुंदर लेखन का प्रमाण नहीं होती, वैसे ही अच्छी याददाश्त अच्छी यादों का प्रमाण नहीं होती। किसी और के शब्द याद दिलाकर, या खुद अपने शब्द उनके दिए हुए पैटर्न में बुनकर मैं किसे बुद्धू बनाने जाती? जिसकी बुद्धि बिजली-सी चमककर कईं बार मेरी अनजान राहें उजागर कर देती है उसे? उतनी भी नासमझ नहीं हूँ नं मैं! बुरा बस इसी बात का लगता था के अनकहीं बातें अनकहीं रहने देने की रोमांचकता संदेह से हाथ मिलाए रहती है।



आज कुछ सोच रही थी तो पता नहीं क्यूँ, ऐसे लगा : If I conceive a child and later encounter some major financial calamity, you would be the only person I would come to ask for help towards its education.



कल्पना की बचकानी बारीकियों पे हँस रही हो?

जितना मुझे जानती हो - शायद समझ जाओगी के तुम मेरे लिए क्या हो।

Friday, November 20, 2009

पुरानी बात है मितवा.
तुम हमें छोड़ चले थे.
किसी दूर देस जा रहे थे..दोगुना दुख था. दोगुने सवाल.
"तुम क्यों जा रहे हो?" और "तुम वहाँ क्यों जा रहे हो जहाँ मुझे जाना था?"
एक मन चाहता, तुम्हारे साथ मैं भी अपना घर छोड़कर चल दूँ.
पर निकलने से पहले तुम मुझे एक गुडिया सौंपकर चले गए.
उसके बाल सहलाकर तुमने कहा था मुझसे, "इसका खयाल रखना. बड़ी भोली है."
मुझे बड़ा ग़ुस्सा आया था.
वाह रे मुसीबत. एक तो तुम्हारा साथ छूटा जाता है, ऊपर से किसी तिकडम्‌ गुडिया का खयाल रखो.
मैंने तुमसे तो कुछ नहीं कहा.
कहती भी तो क्या? कि गुड़िया से जलन होती है? हँसने लगते तुम , और शायद मेरा मन नारियल की शाख जैसा कट बिखरता.

कुछ दिन गुज़र गएँ उसके बाद. गुडिया को मैंने घर के सबसे अँधेरे कोने में बिठाकर रखा था.
एक दिन जालें झटक रही थी तो उसपर नज़र पड़ी.
मैंने उसे उठाकर अपने हाथों में लिया. उसके बालों में से हाथ फेरते हुए मैंने देखा, बड़ी सुंदर थी आँखे उसकी. लगता था उन आँखोंने कोई असुंदर वस्तु कभी देखी ही नहीं थी.
तुम्हारी याद में नहीं, मितवा - मैं अपनी चाह में गुडिया का खयाल रखूँगी.

***

तुम सामने थे तो खलबली उठती थी - पर निकल गए तो यूँ बिन बवंडर के.
रात भर रो-धोकर धमाधम शोर मचानेवाली रूदाली पौ फटते ही घूँघट ओढकर चुपके से पिछवाडे से चली गई जैसे.

Monday, June 08, 2009

मितवा,

आज से पहले तुम्हारी तीन तरह की आवाज़ें सुनी थीं।

पहली (जो मुझे सब से ज़्यादा पसंद है) - पाँच साल के बच्चे का खिलखिलाता उत्तेजित स्वर लेकर आती थी। लगता था सीधे तुम्हारे पेट से निकलकर ऊपर उठती आ रही है - मणिकरण का फौवारा! कभी तुम्हें मेरी याद आ रही हो, और तभी अचानक से मैंने फोन कर दिया - तब मेरा नाम एक ख़ास आवाज़ में लिया करते थे तुम। उस आवाज़ की आयु कुछ खास लंबी न थी. मेरे नाम से लेकर एक साँस में आनेवाले तुम्हारे अगले शब्दों तक बस: "कैऽऽसी हो रे? पत्ता है, किन्नीऽऽऽ याद आ री थी तेरी!"
फ़िर तुम्हारा वो बचपन मेरे उत्तर में प्रतिबिंबित हो जाता, और उसके जवाब में तुम अपनी बड़प्पन की भूमिका निभाने लग जाते। उस पूरे संभाषण-भर में फ़िर मैं राह देखती रहती..कब हम दोनों की चुप्पी हो जाए एक साथ, और कब तुम्हारी ’अंदरूनी आवाज़’ "और बताऽऽओ.." बोलती हुई बाहर निकल पडे।

दूसरी (जिससे मैं सब से ज़्यादा अचम्भित हूँ) तुम्हारी बाहरी आवाज़। रोज़मर्रे की। बड़प्पनवाली। यह तुम्हारे पूरे कंठ से निकलती थी (कुछ ग़ुस्सा होते या ज़्यादा खुश होते तब शायद फेपड़ों तले से निकल आती थी)। इस आवाज़ के ना जाने कितनें दीवानें! याद है, तुम्हारे प्रेजेन्टैशन के बाद उन जर्मन प्रोफ़ेसरसाहब नें कितनीं मिन्नतें की थीं तुम्हें अपनी इन्स्टिट्यूट में लेकर जाने के लिये! ’वाट अ ब्यूटिफ़ुल वॉइस..वाट ब्यूटिफ़ुल डिक्शन!’ - कम से कम छह बार तो बोले होंगे पूरे पाँच मिनटों में। सच कहूँ तो सहमती थी तुम्हारी इस आवाज़ से मैं कभी कॅंवार। ’मैं तुम्हारे चरणों तले की धूल’ वाली भावना जागृत जो हो उठती थी! पर फ़िर मेरा कान पकड़कर उसी आवाज़ में तुमनें क्या कुछ न समझाया...उस आवाज़ की जादू तो देखो - सब इन्फ़ीरियोरिटी काम्प्लेक्स दूर हो गया!

तीसरी (जिसका मैं सब से ज़्यादा सम्मान करती हूँ) तुम्हारी ऊपरी आवाज़ । यह लगती थी जैसे तुम्हारे मेरुदंड से उठकर माथे तक जाकर कंठ के ऊपरी हिस्से से बाहर निकल रही है। इस आवाज़ में बोलते थे तब तुम इस दुनिया के सामान्य इन्सान लगते ही नहीं थे। बातें तो वहीं होती थी.. हर रोज़ की तरह। पर लगता था तुम मुझसे नहीं, अपने आप से बातें कर रहे हो। गहन, गहरी बातें - जो मैं समझने न पाती। लगता था बहुत खलबली मची है तुम्हारे अन्दर..दिखता था के अभिमन्यू की तरह जूँझ रहे हो तुम जिस भी चक्रव्यूह से घिरे हो - और सब के बीच रहकर भी अपने अन्दर यह लड़ाई जारी रखनेवाले तुमपर मुझे बड़ा प्यार आता।

पर आज, मितवा...
कुछ अच्छा नहीं लगा आज तुम्हारी आवाज़ सुनकर।
सच कहूँ तो बड़ा ही खराब लगा।
उस नासपीटी आवाज को तुम्हारी आवाज कहने का मन ही नहीं कर रहा।
कितनी खोंखली थी वह आवाज़! पूरा जीवनरस सूखकर नष्ट हुए फल के अंदर बीज मानो खड़-खड़ बज रहें हो।
उस आवाज़ में मुझे ’मधुशाला’ भी सुनाते तो लगता : हाला कबकी खत्म हुई, और पीनेवालों का ही नहीं , साक़ी का कण्ठ भी सूख चुका है।
न जानें कितनी अशुभ प्रतिमाएँ मन में जाग उठी। कभी लगे तुम्हें कुरेद कुरेदकर खा डाला है इस आवाज़ ने, और अब ब्रह्मराक्षस बन कर तुम्हारा रूप धारण कर आ बैठी है तुम्हारे ही गले में। कभी लगे कीटाणुओंकी तरह तुम्हें जक़ड लिया है इसने और तुम्हारा गला दबोचे जा रही है, इतनी तेज़ की तुम्हारी अपनी आवाज़ तुम्हारे हृदय से बाहर आने ही न पाएँ।

मितवा, आज तक तुम्हारी कोई पीड़ा सुनकर इतनी चिंतित नहीं हुई थी जितनी अब, जब इस आवाज़ में तुमनें कहा - ’सच कहता हूँ, मैं खुश हूँ’।

झूठ जब समझदारी का नक़ाब पहने सामने आता है, बहुत असुंदर लगता है।

फ़िर से अपने आप में वापस समा जाओ, मेरे मीत...नासमझ ही सही - पर सच्चे बने रहो!

Wednesday, March 11, 2009

जोगिरा सा रा रा रा!!!

होली है!

महाराष्ट्र में होली पर रंग खेलने की परम्परा नहीं थी - हम बचपन में रंग खेलते थे होली के बाद पाँचवे दिन पर - ’रंगपंचमी’ कहलाता था वह दिन.
पर अब जब के गंगाजी का पानी पाँच साल पी ही लिये हैं, तो होली का ’होलिका माता’ के साथ साथ रंगों से भी नाता जुड़ ही गया है.

फिर अभी जमशेटपुर की एक बेसी दिलवाली लड़की के साथ दोस्ती हो गयी, तो उसने ’जोगिरा’ परम्परा के बारे में बताया. होली के दिन रंगो के साथ साथ लय में डूबे हुए शब्द भी उड़ाएँ जाते हुएँ देखे थे उसने. एक लय में कोई कुछ पंक्तियाँ बोलना शुरू करता - जब वो रुकता तो कोई और उसी लय में अपनी कुछ पंक्तियाँ बोलता..लय बदलनी है तो बोलो सा रा रा रा..जोगिरा सा रा रा रा! उत्तर-पूर्व भारत और नेपाल में यह परम्परा विकसित हुई शायद.
अब जहाँ कवन-कबित्त की बात हुई तहाँ हमारा मन ना अटके, यह कभी मुमकिन है?

जोगिरा के इस http://www.youtube.com/watch?v=9XGFWVwsap4 वीडियो को देख कर दिमाग में ढोल बजने लगा, और एक जोगिरा बाहर निकला:

जोगिरा सा रा रा रा..

हम आएँ हैं होरिया में मनरंग लैके
अमिया का खिलता जौबनरंग लैके
कान्हे की बांसुरि का अंग अंग लैके
**
लौंगा-इलाची का बीडा ठो लैके
बिरहा में मीरा की पीड़ा को लैके
राधा कन्हाई की क्रीडा को लैके
**
बरखा में बदली की छाया को लैके
रीसर्च की झूठी मोहमाया को लैके
मोर की लचकती-सी काया को लैके
**
जोगिरा सा रा रारा..

बेली पर फूल है
काली पर शूल है
अपना उसूल है
तो और का चाहिये?
**

मैया का प्रेम है
ज़ंदगी एक गेम है
तेरा-मेरा सेम है
तो और का चाहिये?
**

हाथ में गुलाल है
पेट में हलाल है
टेंटुआँ सम्हाल है
तो और का चाहिये?

**
जोगिरा सा रा रा रा...

Tuesday, November 20, 2007

मितवा,पतझड़ शुरू हो गयी यहाँ पर.
कितने सुंदर पत्ते थे मेपल के...लाल, पीले, हरे, बैंगनी. फ़िर धीरे धीरे सारे भूरे बन गयें, और एक दिन सुबह उठकर देखा तो एक-एक पत्ता ज़मीन पर उतरा हुआ!
बड़े पेड़ों की शाखाओं में तो विरक्त जोगी की-सी गम्भीरता दिखाई भी देती है - पर कुछ नन्हें पौधे और अन-बनी उम्र के पेड़ हैं जिनकी शक्ल-ओ-सूरत मुझ से देखी नहीं जाती.
मन करता है उनके सारे पत्तों में गुब्बारों जैसी डोरियाँ लगाकर हर पौधे पे लटका दूँ! कितने प्यारे लगेंगे ना हवा में लहराते हुए...


मुझे भी एक ड़ोर चाहिये..यादों के कईं सुनहरे पत्ते खो चुकी हूँ आज तक!

Wednesday, October 24, 2007

Leaving re-read and loved books back is bad enough, it's like leaving friends behind to go to some other place - but leaving much-anticipated-though-unread books back is the worst thing of all. It's like leaving untold love behind.

Saturday, October 20, 2007

The longest word.

The clever ones hide the chalks at a certain place, he said.
"How thankful are we for the fluorescence! I for one, wouldn't want my hands charred
every time I reach for the hidden chalk" I whispered to her -- received a blank stare.
And a bench apart, you smiled knowingly.
I don't know why, but in sharing that foolish little triumph of having solved the two penny mystery of the chalk-on-the-tube light, I felt the two of us to be extraordinarily clever.
(Well, me more so. I had come up with the witty remark.)
(Uh..no, actually it was you. For being able to keep your mouth shut and enjoying the discovery secretly.)
(And I admit, it wasn't that witty either. More of nerdy, I guess.)

So anyway, I just wanted to tell you that it's been like..kinda fun..
Those swift glances at each other to see how the other is appreciating the professor's wisecracks. Coming up with a PGW-style scale for the degree of amusement: one-eighth of an inch of smile, one-fourth, and so on.

And now so long, goodbye! I've gotta fill my head with more important things like ferroelectric perovskites right now. Hope to see that smile en route sometimes. Although..it's already en coeur.